” यो दादा सर्व भूतेषु , खागड़ रूपेण संसिथ्त नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो: नमः ।। “
बूढ़ा बैल ( खागड )
दादा खेड़े का हर जगह वास हैं , प्रायः गांव में खागड़ / बूढ़े खागड़ में दादा खेड़े का वास बताया गया हैं । देखा भी गया हैं कि एक बूढ़ा बैल हर रोज गांव के लगभग हर घर से रोटी या हरा चारा ग्रहण करता है ।
तेरी शरण खड़े दादा ध्वजाधारी हम तेरी शरण खड़े दादाध्वजाधारी … 2 इस भूमि पर राजा बन कर यज्ञ हुए थे बेशुमार … बौना बनकर दर्शन दे दिए हुई भगत की जय जयकार । उसी पावन भूमि के ऊपर हो … ध्वजा फर्राटे ठारी … ओ तेरी शरण खड़े दादा ध्वजाधारी …2 जब भी किसी शत्रु ने तेरे दर पर करी चढ़ाई .. आँख फोड़ दी अंधे कर दिए कुछ ना पार बसाई … समय समय पर दिए दिखाई तेरी घोड़े की हैं सवारी … तेरी शरण खड़े ध्वजाधारी हम तेरी शरण खड़े …2 ध्वजा मिठाई ज्योत चढ़ावै सबकै काज सवारे… मझदार मै नैया डोळे उसको पार उतारे .. हर इतवार को मेला भरता पुजै नर और नारी … हो तेरी शरण खड़े ध्वजाधारी हो तेरी शरण खड़े … 2 हाथ जोड़ कै करै बिनती चरणों मे शीश हमारा … गाम बल्ला करनाल जिला जहां अपना गुरुद्वारा … कामसिंह कहै गुरु हमारा श्री जैन्ने राम प्रचारी … हो तेरी शरण खड़े दादा ध्वजाधारी हो तेरी शरण खड़े …2 ।
दादा खेड़ा जी महाराज की आरती पंडित श्री काम सिंह जी द्वारा रचित हैं । उनके गुरु का नाम पंडित श्री जैन्नेराम जी हैं । 90 के दशक में काम सिंह जी ने आरती लिखी थी । उस समय आरती गायन सुर ताल के साथ वाद्य यंत्रों के साथ दादा खेड़ा स्थल पर गाई जाती थी । आज भी गाँव मे होने वाले खेलो, रामलीला , मीटिंग , रागनी समारोह आदि में भी गाँव के कलाकारों व छोटे बड़े सभी द्वारा गाई जाती हैं । गाँव मे चारो ओर लगे स्पीकरों की सहायता से सुबह श्याम आरती चलाई जाती हैं ।
महाराजा बलि सप्तचिरजीवियों में से एक, पुराणप्रसिद्ध विष्णुभक्त, दानवीर, महान् योद्धा, थे । दैत्यराज बलि जिसकी राजधानी महाबलिपुर थी।
राजा बलि से यज्ञ के समय भेंट करते हुए वामनदेव
महाराजा बलि ने अपना 100वां यज्ञ कहाँ किया
महाराजा बलि ने तीनों लोकों पर विजय प्राप्त कर ली थी । वे अपने जीवन काल का 100वां अखण्ड यज्ञ कर रहे थे । यज्ञ के दौरान वामन रूपी विष्णु ने राजा बलि से तीन पग भूमि माँगी। वामन ने तीन पग भूमि दान में माँगी और संकल्प पूरा होते ही विशाल रूप धारण कर प्रथम दो पगों में पृथ्वी और स्वर्ग को नाप लिया था । शेष दान के लिए महाराजा बलि ने अपना मस्तक नपवा दिया । यह यज्ञ हरियाणा के गाँव बल्लाह मे किया गया था । जब राजा बलि ने यहाँ यज्ञ किया था उस के बाद ही गाँव का नाम बल्ला पड़ा । आज भी यहाँ राजा बलि को माना जाता हैं । साल भर में अखण्ड यज्ञ का आयोजन किया जाता हैं। गाँव के बिंचो बीच महाराज बलि का स्थल व स्मारक बनाये गए है ।